त्रि-भाषा फार्मूला: छठी कक्षा को राहत मिली, पर असली सवाल अभी बाकी हैं
सुप्रीम कोर्ट ने छठी कक्षा के छात्रों को तीसरी भाषा में बड़ी राहत दी है। लेकिन यह फैसला एक बड़ा सवाल भी खड़ा करता है: क्या देश त्रि-भाषा फार्मूले को ज़मीन पर उतारने के लिए सच में तैयार है?
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के बाद शिक्षा के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं। इन्हीं में से एक है त्रि-भाषा फार्मूला, जिसके तहत छात्रों को तीन भाषाएँ पढ़नी होती हैं। इसी को लेकर 28 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट का एक बड़ा फैसला छठी कक्षा के छात्रों के लिए आया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
- 28 सितंबर 2026फैसले की तारीख
- कक्षा 6अब राहत में शामिल
- आंतरिकतीसरी भाषा का मूल्यांकन
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने CBSE से कहा कि सातवीं कक्षा के छात्रों को जो राहत दी गई है, वही छठी कक्षा के छात्रों को भी दी जाए। अब छठी कक्षा के छात्र भी सातवीं, आठवीं और नौवीं के छात्रों की तरह तीसरी भाषा पढ़ेंगे, लेकिन दसवीं में उसकी अलग बोर्ड परीक्षा नहीं होगी। उसका मूल्यांकन स्कूल के अंदर ही होगा और उसके अंकों का दसवीं के परिणाम पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इसे लागू करने में आ रही व्यावहारिक कठिनाइयों को माना, जैसे सत्र के बीच में भाषा बदलना, किताबों की उपलब्धता और शिक्षकों की कमी। पीठ ने कहा कि छात्रों को परेशानी नहीं, सहूलियत मिलनी चाहिए। कोर्ट ने नीति को खारिज नहीं किया है, और इससे जुड़े बड़े सवालों पर सुनवाई अभी जारी है।
त्रि-भाषा फार्मूला: अब तक का सफ़र
- 1968
राष्ट्रीय शिक्षा नीति में त्रि-भाषा फार्मूला पहली बार अपनाया गया।
- 1968
तमिलनाडु ने दो भाषा नीति (तमिल और अंग्रेज़ी) अपनाई, जो आज तक चल रही है।
- 2020
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने फार्मूले को बनाए रखा, पर कहा कि किसी भी राज्य पर कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी।
- 28 सितंबर 2026
सुप्रीम कोर्ट ने छठी कक्षा के छात्रों को भी तीसरी भाषा में राहत दी।
मेरी राय: विकल्प हो, अनिवार्यता नहीं
मेरा मानना है कि त्रि-भाषा को लेकर देश अभी बुनियादी रूप से पूरी तरह सक्षम और मज़बूत नहीं हुआ है। ऐसे में छात्रों को तीसरी भाषा एक विकल्प के रूप में मिलनी चाहिए, अनिवार्य रूप में नहीं।
एक भाषा को अनिवार्य बना दिया गया, लेकिन उसके अंकों को असली रिपोर्ट कार्ड में जगह नहीं दी गई। यही इस नीति का सबसे बड़ा विरोधाभास है।
इससे यही लगता है कि त्रि-भाषा फार्मूले को लेकर नीति के स्तर पर अभी स्पष्टता नहीं है।
त्रि-भाषा फार्मूला क्यों ज़रूरी है
मैं इस लेख के ज़रिए त्रि-भाषा फार्मूले के महत्व को कम नहीं बता रहा हूँ। इसका महत्व अपनी जगह कायम है:
- स्मरण शक्तिअलग-अलग भाषाएँ सीखने से स्मरण शक्ति के विकास की पूरी संभावना है।
- संस्कृति और साहित्यदेश की अलग-अलग संस्कृतियों से जुड़ना और क्षेत्रीय भाषाओं का साहित्य समझना।
- रोज़गार के अवसरअनुवाद, पर्यटन जैसे क्षेत्रों में कई नए अवसर बन सकते हैं।
- राष्ट्रीय एकतादेश में सांस्कृतिक एकता और समग्रता की पहचान बन सकता है।
ज़मीन पर असली मुश्किलें
भारत जैसे विशाल और विविधता से भरे देश में, जहाँ दुनिया की सबसे बड़ी जनसंख्या रहती है, त्रि-भाषा फार्मूले को ज़मीनी स्तर पर लागू करना आसान काम नहीं है। इसके रास्ते में कई कठिनाइयाँ हैं, जो राजनीति से शुरू होकर संसाधनों तक जाती हैं।
01शिक्षक और संसाधन कहाँ से आएँगे?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या त्रि-भाषा फार्मूले को लागू करने के लिए जितने संसाधन चाहिए, उतने हमारे पास हैं? इसका जवाब है, नहीं। देश में बुनियादी और प्रमुख विषयों को पढ़ाने के लिए ही शिक्षकों की कमी है। ऐसे में तीसरी भाषा के लिए पर्याप्त शिक्षक कहाँ से आएँगे? और जो शिक्षक उपलब्ध हैं, क्या उन्हें उस भाषा का ज्ञान है, इस पर भी ध्यान देना होगा।
02छात्रों पर पढ़ाई का बोझ
मौजूदा रूप में त्रि-भाषा फार्मूले से बच्चों पर पढ़ाई का बोझ काफी बढ़ सकता है। छात्र एक ऐसा विषय पढ़ेगा जिसके अंक उसकी रिपोर्ट कार्ड में जुड़ेंगे ही नहीं। कहीं ऐसा न हो कि हम छात्रों को बहुत कुछ पढ़ाने की कोशिश में उनके प्रमुख विषयों की बुनियादी पढ़ाई को ही कमज़ोर कर दें।
03भाषा पर राजनीति
त्रि-भाषा फार्मूला 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति से चला आ रहा है, और तब से किसी न किसी रूप में इसका विरोध होता रहा है। तमिलनाडु ने इसे अपनी अस्मिता से जोड़ा और 1968 से ही दो भाषा नीति (तमिल और अंग्रेज़ी) अपना रखी है। दक्षिण भारत में लंबे समय तक भाषा के आधार पर राजनीति होती रही है।
सच तो यह है कि भाषा शिक्षा और समाज का विषय है। इसे राजनीति से जोड़कर राजनीतिक रोटियाँ सेंकना बिल्कुल गलत है। सभी राजनीतिक दलों को त्रि-भाषा फार्मूले पर राजनीति बंद करनी चाहिए।
04तकनीकी शिक्षा भी उतनी ही ज़रूरी
देश के कई राज्यों में बेरोज़गारी एक बड़ी समस्या है और छात्रों में तकनीकी ज्ञान की काफी कमी है। इसलिए त्रि-भाषा फार्मूले के साथ-साथ हमें तकनीकी शिक्षा पर भी ज़ोर देना चाहिए।
आगे का रास्ता
मैं त्रि-भाषा फार्मूले के खिलाफ नहीं हूँ। मेरा उद्देश्य इसे लागू करने की प्रक्रिया में जो कमियाँ हैं, उन्हें सामने लाना है। इसे पूरी तरह और सफलतापूर्वक लागू करने के लिए ये कदम ज़रूरी हैं:
- बुनियादी ढाँचा पहलेसरकार शिक्षकों, किताबों और प्रशिक्षण जैसे ज़रूरी ढाँचे का विकास करे।
- विशेषज्ञ कमेटीत्रि-भाषा फार्मूले को अमलीजामा पहनाने के लिए विशेषज्ञों की एक कमेटी बनाई जाए।
- छात्रों और अभिभावकों की रायबड़े पैमाने पर आम छात्रों और अभिभावकों के सुझावों को महत्व दिया जाए।
- राज्यों की सहमतिराज्यों के साथ मिलकर ऐसा माहौल बनाया जाए कि उन्हें यह न लगे कि यह फार्मूला उन पर ज़बरदस्ती थोपा जा रहा है। NEP 2020 भी यही कहती है कि किसी भी राज्य पर कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी।
- वैकल्पिक, अनिवार्य नहींशैक्षणिक रूप से तीसरी भाषा को अनिवार्य न बनाकर वैकल्पिक रूप में दिया जाए।
निष्कर्ष
जब तक त्रि-भाषा को लेकर देश में व्यापक सहमति नहीं बनती और एक समग्र नीति पर काम नहीं होता, तब तक इसे व्यावहारिक ढाँचे में ढालना मुश्किल रहेगा। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला छात्रों के लिए राहत है, लेकिन असली काम अब सरकार और राज्यों को मिलकर करना है।
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